दूरसंचार विभाग से 3जी और ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम हासिल करने वाली कम्पनियों को भले ही अपनी जेब ढीली करनी पड़ी हो, लेकिन इससे सरकार का खजाना जरूर भर गया। वित्त मंत्री ने नीलामी के जरिये जहाँ 35-40 हजार करोड़ रुपए मिलने का अनुमान लगाया था, वहीं इससे सरकार को 1 लाख करोड़ से भी अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ है। अब सरकार इस राशि के इस्तेमाल से राजकोषीय घाटे को कम करने पर विचार कर रही है। लेकिन गहराई से विश्लेषण किया जाए तो यह आमदनी साल 2008 में हुई 2जी नीलामी की भरपाई मात्र ही है। वैसे नीलामी से इकठ्ठा हुई राशि की एक वजह यह भी है कि भारत की तेजी से बढती आबादी में टेलिकॉम कम्पनियों को सुनहरा भविष्य नज़र आ रहा है, यही वजह है की स्पेक्ट्रम नीलामी से मिली राशि सरकार की उम्मीद से कहीं ज्यादा है। स्पेक्ट्रम हासिल करने की होड़ में शामिल कुल 11 कम्पनियों में से जहाँ अमेरिकी कम्पनी क्वालकॉम ने सरकार को सबसे अधिक 4912 करोड़ का भुगतान किया है, वहीं दूसरी टेलिकॉम कम्पनियां भी पीछे नहीं हैं।आप सभी का स्वागत करता है...
Saturday, June 12, 2010
राजा के दिए ज़ख्म पर 3जी का मरहम
दूरसंचार विभाग से 3जी और ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम हासिल करने वाली कम्पनियों को भले ही अपनी जेब ढीली करनी पड़ी हो, लेकिन इससे सरकार का खजाना जरूर भर गया। वित्त मंत्री ने नीलामी के जरिये जहाँ 35-40 हजार करोड़ रुपए मिलने का अनुमान लगाया था, वहीं इससे सरकार को 1 लाख करोड़ से भी अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ है। अब सरकार इस राशि के इस्तेमाल से राजकोषीय घाटे को कम करने पर विचार कर रही है। लेकिन गहराई से विश्लेषण किया जाए तो यह आमदनी साल 2008 में हुई 2जी नीलामी की भरपाई मात्र ही है। वैसे नीलामी से इकठ्ठा हुई राशि की एक वजह यह भी है कि भारत की तेजी से बढती आबादी में टेलिकॉम कम्पनियों को सुनहरा भविष्य नज़र आ रहा है, यही वजह है की स्पेक्ट्रम नीलामी से मिली राशि सरकार की उम्मीद से कहीं ज्यादा है। स्पेक्ट्रम हासिल करने की होड़ में शामिल कुल 11 कम्पनियों में से जहाँ अमेरिकी कम्पनी क्वालकॉम ने सरकार को सबसे अधिक 4912 करोड़ का भुगतान किया है, वहीं दूसरी टेलिकॉम कम्पनियां भी पीछे नहीं हैं।Wednesday, May 19, 2010
हर गिरावट में तलाशें निवेश के मौके

Wednesday, February 24, 2010
बंगाल के चुनावी ट्रैक पर दौड़ी 'ममता' मेल
यूपीए सरकार में लगातार अपना दूसरा रेल बजट पेश करने वाली ममता बनर्जी ने लोकलुभावन बजट से जनता को खुश कर दिया। पिछले 7 सालों से यात्री किराए में नहीं की गयी बढ़ोत्तरी को इस बार भी जारी रखते हुए ममता ने लालू की तर्ज पर कई बड़ी घोषणाएं कीं। लेकिन इन सबके बीच अपने पूरे बजट भाषण के दौरान ममता बंगाल पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान दिखीं।Sunday, January 24, 2010
बजट तक गुलजार रहेगा बाज़ार

महंगाई के चलते पहले से ही राजनीतिक विरोध झेल रही सरकार भी बाज़ार को लेकर चिंतित नज़र आ रही है। और हो भी क्यों ना, आखिर बाज़ार किसी भी देश कि अर्थव्यवस्था कि प्रगति का सूचक जो है। ऐसे में इसी महीने आने वाली आरबीआई की क्रेडिट पोलिसी में महंगाई को नियंत्रित करने का भी भारी दबाव रहेगा। क्या बाज़ार से अतिरिक्त नकदी खींचने के लिए प्रमुख ब्याज दरों में इजाफा होगा? अगर ब्याज दरें बढाई गयीं तो बैंकिंग सेक्टर पर क्या प्रभाव पड़ेगा। ये सवाल सिर्फ हमारे ही नहीं बल्कि सरकार के दिमाग में भी कौंध रहे होंगे। ऐसे में इनसे निपटने के लिए सरकार कम से कम बजट तक तो ब्याज दरें बढाने का रिस्क नहीं लेगी। जहाँ तक महंगाई का सवाल है तो जनता आज से नहीं बल्कि काफी समय से इसे झेलती आई है। यू पी ऐ सरकार अपनी दूसरी पारी के पहले बजट में किसी भी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहेगी। इसलिए बजट के पहले बाज़ार में किसी भी तरह की गिरावट की आशंका कम ही है। हाँ बजट के बाद बाज़ार का मूड क्या होगा, इसका अंदाजा तो बजट में हुई घोषणाओं के बाद ही लगेगा। फिलहाल बजट तक निवेशकों को डरने की जरूरत नहीं है।
Wednesday, August 5, 2009
आख़िर क्यों महँगी हो रही मिठास ?

सुबह उठते ही चाय की चुस्कियों से लेकर रात के खाने तक, शायद ही हम चीनी के इस्तेमाल के बिना रहते हों, लेकिन अब हमें यह आदत जल्द बदलनी पड़ सकती है। इसका कारण साफ़ है कि जिस तरह से चीनी के दाम आसमान छू रहे हैं, उसे देखकर तो यही लगता है कि हाल-फिलहाल इससे राहत मिलने कि उम्मीद कम ही है। ऊंचे तबके से लेकर निम्न तबके तक लगभग सभी अपने दैनिक जीवन में किसी न किसी रूप में चीनी का उपयोग अवश्य करते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से इसके बदले तेवरों के चलते लोगों को मिठास का एहसास कराने वाली चीनी का स्वाद कड़वा होता जा रहा है।
अगर हम वर्ष 2009 के दौरान चीनी के दामों में आई तेज़ी पर नज़र डालें तो खुदरा बाज़ार में जनवरी में इसकी कीमत 21 रुपये/किलो थी, हालांकि यह कीमत भी सामान्य दाम से लगभग 4 रुपये/किलो ज्यादा थी, लेकिन इसके बावजूद लोगों ने चीनी खाना कम नहीं किया। बढती मांग को देखते हुए चीनी के भाव और चढ़ने लगे और मार्च आते-आते इसने 25 रुपये/किलो का स्तर छू लिया। अब लोगों को और सरकार को भी लगने लगा कि चीनी ने तेज़ी कि राह पकड़ ली है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने अपनी ओर से चीनी के दामों में लगाम लगाने कि कोशिश न कि हो, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीनी के दामों में आए उछाल कि वजह से इसपे काबू पाना सरकार के बस में भी नहीं रहा। खैर जैसे-तैसे 2 महीने का वक्त गुजरा लेकिन चीनी के दाम बेकफुट पर आने के बजाय फ्रंटफुट कि ओर बढ़ने लगे और मई आते-आते चीनी ने 27 रुपये/किलो के आंकडे को छू लिया। दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की कर रहे चीनी के दामों ने इस बार सरकार के भी कान खड़े कर दिए और और सरकार ने आनन-फानन में चीनी पर "स्टॉक होल्डिंग और टर्नओवर लिमिट लगाने के साथ ही इसके वायदा कारोबार पर भी रोक लगा दी।
चीनी के दामों को नियंत्रित करने के लिए उठाये गए इन क़दमों से सरकार को ही नहीं बल्कि आम जनता को भी लगने लगा कि अब शायद चीनी फिर से आम आदमी कि पहुँच में होगी, लेकिन नतीजा फिर वही "ढाक के तीन पात"। स्टॉक होल्डिंग लिमिट बंद किए जाने के बाद भी राज्य सरकारों द्वारा इसकी अनदेखी कि जा रही है और नतीजा ये है, कि देश में अब तक सिर्फ़ 11 राज्यों ने ही इस फैसले को लागू किया है। इसमे सबसे चिंता की बात ये है कि चीनी कि सर्वाधिक खपत वाले बड़े राज्य उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश ने भी इसे लागू नहीं किया है।
चीनी के बढ़ते दामों के लिए केन्द्र ही नहीं बल्कि राज्य सरकारें भी दोषी हैं और यही वजह है कि जून में चीनी के दाम 30 रुपये/किलो के स्तर पर पहुँच गए। अर्थशास्त्र कि भाषा में अगर बात करें तो चीनी कि कीमतों में आई तेज़ी का सबसे बड़ा कारण मांग और उत्पादन में भारी अन्तर है, उपभोक्ता मांग के अलावा फ़ूड प्रोसेसिंग, फास्ट फ़ूड तथा रेस्टोरेंट आदि में भी चीनी कि मांग तेज़ी से बढ़ी है, इसके अलावा ग्रामीण परिवेश में भी अब तेज़ी से बदलाव आ रहा है और लोग गुड कि बजाय शक्कर ज्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं। इन सबकी तुलना में यदि उत्पादन कि बात करें तो वह साल-दर-साल घटा है। इसके अलावा मौसम भी शक्कर के दामों में आई तेज़ी का प्रमुख कारण है। चीनी के मुख्य स्त्रोत गन्ना को काफ़ी पानी और मेहनत कि जरूरत होती है, लेकिन पिछले कुछ समय से गन्ना किसानों को मौसम कि बेरुखी का सामना भी करना पड़ा है, जिसके चलते अब किसान भी गन्ने कि खेती करने से कतराने लगे हैं। इन सबके अलावा चीनी के दामों में तेज़ी का एक कारण कहीं न कहीं राजनीती भी है। केन्द्र और राज्य सरकारों में आपसी सामंजस्य न होने के कारण राज्य सरकारें गन्ने का का दाम बेतुके ढंग से बढ़ा रही हैं, जिसके चलते चीनी मिलों को गन्ना खरीदने में दिक्कत हो रही है, फलस्वरूप गन्ने का रकवा घट रहा है और किसान कम पैदावार कर रहे हैं।
चीनी के बढ़ते दाम को नियंत्रित करने के लिए सरकार काफ़ी हाथ-पैर भी मार रही है, और यही वजह है कि लगभग 17.5 लाख टन रा- शुगर आयात की जा चुकी है और १५ अगस्त तक यह आंकडा लगभग 18.5 लाख टन पहुँचने कि उम्मीद है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी के 25 साल के उच्चतम स्तर पर पहुँचने के कारण भी इसकी कीमतों में तेज़ी आई है। इसके साथ ही जानकारों के मुताबिक त्योहारी सीज़न में मांग बढ़ने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कीमतें तेज़ रहने कि वजह से आने वाले 3 महीनों में चीनी के दाम और बढ़ सकते हैं। वैश्विक हालातों और देश में मौसम की बेरुखी देखकर तो यही लगता है, कि आने वाले समय में चीनी कि मिठास खटास में बदलने वाली है और ऐसे में अमिताभ और तब्बू अभिनीत फ़िल्म का ये गाना सटीक बैठता है, कि "चीनी कम है...चीनी कम...थोडी-थोडी तुझमें है, थोडी-थोडी कम-कम...
Thursday, July 30, 2009
महंगाई दर पाताल में, कीमतें आसमान में

लगातार सात महीनों से थोक मूल्य सूचकांक शून्य से नीचे बना हुआ है, हालांकि महंगाई दर के इस तरह के आंकडे देखकर सरकार और रिज़र्व बैंक भी कम चिंतित नहीं हैं, लेकिन इन आंकडों के उलट दूसरी तरफ़ जो हकीकत है, उससे देश का हर आदमी परेशान है और यही सोच रहा है, कि आख़िर हर सप्ताह जारी किए जाने वाला महंगाई दर का आंकडा तो लंबे समय से शून्य से भी नीचे बना हुआ है, फिर आख़िर वस्तुओं के दाम क्यों नहीं कम हो रहे? वाकई ये सवाल एकबारगी हर किसी के मन में उठाना लाजिमी है।
क्या वाकई महंगाई दर कम हो रही है, या ये सिर्फ़ जनता को दिखाने के लिए आंकडों कि बाजीगरी है, क्योंकि पिछले कुछ समय से जिस तरह से खाद्य पदार्थों के दामों में तेज़ी आई है, उससे जनता को राहत मिलती नहीं दिख रही है।
अब सवाल यह उठता है, कि आख़िर इस विसंगति कि वजह क्या है? क्या सरकार जानबूझकर जनता को अंधेरे में रखना चाहती है, या इन आंकडों में सच्चाई है। वैसे जहाँ तक इस विसंगति कि बात कि जाए तो इसके पीछे जो ठोस कारण नज़र आता है, वो है महंगाई दर को मापने का सूचकांक।
भारत में महंगाई दर को मापने के लिए थोक मूल्य सूचकांक का सहारा लिया जाता है, तथा इसके आधार पर हर सप्ताह आंकडे जारी किए जाते हैं। इस सूचकांक का इस्तेमाल उन उत्पादों कि कीमत स्तर में परिवर्तन आंकने के लिए किया जाता है, जिनका कारोबार थोक बाजारों में होता है, जबकि अन्य कई देशों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर महंगाई दर कि गड़ना की जाती है। आंकडों और वस्तुओं के मूल्य में आई विसंगति का सबसे बड़ा कारण यही है कि थोक मूल्य सूचकांक में मात्र ४३५ वस्तुओं को शामिल किया गया है, जबकि उपभोक्ता इससे कहीं अधिक वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं। अतः इस आधार पर या तो सभी उपयोगी वस्तुओं को इसमें शामिल किया जाए, या फिर इसकी जगह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रास्फीति कि गड़ना कि जाए। थोक मूल्य सूचकांक में गिरावट की सबसे बड़ी वजह है, ईंधन और मेनुफक्च्रिंग, और यही कारण है, की महंगाई दर के आंकडे तो कम हैं, लेकिन वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं।
हालांकि सबसे विचारणीय प्रश्न यह है, कि महंगाई दर के ऋणात्मक होने के बावजूद रिज़र्व बैंक ने मौद्रिक नीति कि समीक्षा में कोई ठोस उपाय नहीं किए। सिर्फ़ अनुमान लगाया है कि २०१० में यह ५ फीसदी के करीब आ जायेगी। अब देखना है, कि रिज़र्व बैंक का यह अनुमान कितना सटीक बैठता है। हालांकि आम जनता को मुद्रास्फीति के आंकडों से कोई मतलब नहीं है, उसे तो बस आसमान छूती कीमतों की चिंता है। अगर सरकार उसे काबू में कर ले तो जनता को अवश्य राहत मिलेगी।
Tuesday, April 7, 2009
जूता मारकर भी जीते इनाम

हालांकि एक पत्रकार की दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी तरह के भावावेश में आकर इस तरह का कदम उठाना निंदनीय है, लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि जब जनता के प्रतिनिधि हमारे विधायक और सांसद ही सदन में एक दूसरे पर जूतम पैजार शुरू कर देते हैं तो भावनाओं में आकर एक पत्रकार को अपने आप पर काबू रखना कितना मुश्किल हुआ होगा, और इसी का परिणाम है जो इतना बड़ा हादसा हो गया। खैर जो हुआ सो हुआ, लेकिन हद तो तब हो गई जब एक विशेष सम्प्रदाय से सम्बद्ध रखने वाले राजनैतिक दल के बड़े नेता ने गृह मंत्री पर जूता फेंकने वाले पत्रकार को सम्मानित करने का निर्णय ले लिया। जी हाँ इस राजनैतिक दल के वरिष्ठ नेता ने कथित पत्रकार के साहस और बहादुरी की प्रशंसा करते हुए उसे 2 लाख रुपये नगद पुरस्कार देने की घोषणा कर दी।
अब इस पुरस्कार की घोषणा ने एक नए सवाल को जन्म दे दिया है। वो ये की कहीं ऐसा तो नहीं की पत्रकार को जूता फेंकने की सुपारी दी गई हो। जिसके एवज में इस घटना को अंजाम दिया गया है, क्योंकि जो काम पत्रकार द्वारा किया गया है, वो कम से कम इतना महान तो नहीं है की इसके लिए उसे इनाम दिया जाए।
हाँ ये बात अलग है की अगर नेताओं ने कुछ ख़ास नही किया तो होम मिनिस्टर पर फेंका गया जूता जाया नहीं जायेगा। उसकी बोली कई कंपनियाँ खड़े खड़े लगाने को तैयार हो जाएँगी । हो सकता है की अब ये जूता और उसे बनने वाली कम्पनी एक ब्रांड के तौर पर उभर कर सामने आयें, क्योंकि बुश पर फेंके गए जूते की बोली 50 करोड़ लगायी गई है। ऐसे में भारतीय कंपनियाँ इतनी भी गई बीती नहीं की इस जूते की कीमत लाखों में न लगे।
बुश पर फेंके गए जूते की प्रतिकृति बनाकर उसे सम्मान सहित सद्दाम हुसैन के गृहनगर तिकरित में बाकायदा एक स्मारक में रखा गया है तो फिर भारतीय जूते का भी सम्मान जरूरी है। अब देखना है की इसे किस स्मारक में रखा जाता है, या फिर इसके लिए कोई नया शू म्यूज़ियम ही बनाया जाएगा।
Wednesday, April 1, 2009
किसी का "जय हो" तो किसी का "भय हो"
भय हो...भय हो...भय हो...
फिर भी जय हो...जय हो...
आजा आजा वोटर इस झांसे के तले
आजा आजा झूठे-मूठे वादे के तले
भय हो... भूख हो...
रत्ती-रत्ती सच्ची हमने जान गंवायी है,
भूखे पेट जाग-जाग रात बितायी है,
मंदी की मार में नौकरी गँवा दी,
गिन-गिन वादे हमने जिंदगी बिता दी,
मंदी हो...महंगाई हो...आतंक हो...
भय हो...भय हो...फिर भी जय हो...
राजनीतिक दलों द्वारा एक दूसरे के जवाब में जो हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, वे वाकई दिलचस्प हैं। चुनाव के समय इस तरह के प्रचार-प्रसार गाहे-बगाहे देखने को मिल ही जाते हैं, जिसमें दो दल आपस में एक दूसरे के नुस्ख निकालने में लगे रहते हैं। खैर मामला जो भी हो, लेकिन एक बात तो तय है की इस विज्ञापन को तैयार करने में किसी न किसी विज्ञापन एजेन्सी और कलाकारों का तो कुछ भला हो ही जाएगा।
खैर इन गीतों के बोल सुनकर जनता किस हद तक प्रभावित होती है, और वाकई में किसकी जय-जयकार होती है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल हम इनकी पैरोडी सुनकर कुछ आनंद तो उठा ही सकते हैं।
Tuesday, March 31, 2009
चुनावी चक्कर में फंसा आईपीओ बाज़ार
हालांकि पिछले हफ्ते सेंसेक्स के 10 हज़ार का मनोवैज्ञानिक स्तर पार करने के बावजूद भी आई पी ओ बाज़ार में कोई ख़ास सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। आई पी ओ बाज़ार में न हो पा रहे इस सुधार के पीछे फिलहाल मुझे 2 कारण नज़र आ रहे हैं। पहला तो ये की विदेशी संस्थागत निवेशक अब भी भारतीय बाजारों में निवेश करने से कतरा रहे हैं और दूसरा ये की जो कंपनियाँ आई पी ओ लाना चाहती हैं वो भी शायद चुनाव ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही हैं। आई पी ओ बाज़ार में छाई सुस्ती का आलम ये हैं की पिछले तीन हफ्तों में सेंसेक्स 20 फीसदी ऊपर आ चुका हैं, लेकिन इसके बावजूद 600 इश्यु लिस्टिंग की कतार में हैं। इन आई पी ओ के कतार में होने का कारण सेंसेक्स की धीमी चाल तो हैं ही, लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ा कारण सेकंड्री मार्केट से अच्छे और सकारात्मक संकेतों का न होना भी हैं। जहाँ तक आई पी ओ बाज़ार का सवाल हैं तो इसकी मजबूती विदेशी संस्थागत निवेशकों के ऊपर काफ़ी कुछ निर्भर करती हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से जिस तरह से भारतीय बाजारों का प्रदर्शन रहा हैं, उसे देखते हुए निवेश की बात तो दूर, ऍफ़ आई आई ने उल्टा पैसा खींचना शुरू कर दिया था। ऐसे में भला आई पी ओ बाज़ार से बेहतरी की उम्मीद करना भी बेमानी ही होगा।
हालांकि जहाँ तक उम्मीद हैं की चुनाव के ठीक बाद सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों एनएच पी सी और आयल इंडिया के आई पी ओ आ सकते हैं। कुल मिलाकर अगर बाज़ार की सभी स्थितियों का विश्लेषण किया जाए तो एक बात साफ़ होती हैं, की कहीं न कहीं निवेशक और कंपनियाँ भी चुनाव के चलते शेयर बाज़ार की अस्थिरता का सामना नहीं करना चाहती। शायद यही वजह हैं की आई पी ओ बाज़ार कहीं न कहीं चुनावी चक्कर में पड़ा दिख रहा हैं और फिलहाल 2 महीने इसके ठंडा रहने के आसार ही नज़र आ रहे हैं।
Saturday, February 28, 2009
ख़त्म हुआ नयनों (नैनो) का इंतज़ार

बात साल 2003 के अगस्त-सितम्बर माह की है, जब टाटा अपने दफ्तर बॉम्बे हाउस से घर लौट रहे थे। अचानक रास्ते में उन्होंने एक युवा दंपत्ति को दो बच्चों के साथ स्कूटर पर भीगते हुए देखा। बस यहीं से टाटा के मन में विचार आया की क्यों न मैं एक ऐसी कार बनाऊं, जिसे मध्यम तबके के लोग भी खरीद सकें। इस घटना के बाद रतन टाटा ने पुणे स्थित टाटा मोटर्स के प्लांट पर जाकर कम्पनी के प्रबंध निदेशक से जाकर इस योजना पर बातचीत की। इसके बाद करीबन पाँच वर्षों तक इस योजना पर काम चलता रहा और अब परिणाम सबके सामने है। हालांकि जब टाटा ने लखटकिया कार के निर्माण का प्रस्ताव रखा तो सभी ने उनका उपहास भी उडाया और वास्तव में आज के प्रतिस्पर्धी दौर में जब इस्पात की कीमतें आसमान छू रही हों तो ऐसी परिस्थितियों में कम खर्चीली तथा पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल कार बनाना कोई आसान काम नहीं था। ये तो धारा की विपरीत दिशा में बहने से कम नहीं था। इसके साथ ही साथ देश के अन्य कार निर्माताओं के अलावा विश्व स्तरीय कार निर्माण क्षेत्र की कंपनियाँ भी प्रतियोगी बन सामने खड़ी थी। किंतु टाटा को तो जैसे बस अपना लक्ष्य दिख रहा था, और वैसे भी जब कुछ करने का जूनून और सपना होता है, तो ये सब बातें गौण लगती हैं। शायद यही टाटा के साथ हुआ। उन्हें अपने सहयोगियों की क्षमताओं पर कतई संदेह नहीं था और आखिरकार उनकी पूरी टीम ने कड़ी मेहनत के बाद लोगों के इंतज़ार की उस घड़ी को ख़त्म कर ही दिया, जब लोग नैनो में सवारी करने की आस लिए बैठे थे। इसके साथ ही टाटा ने उन लोगों को भी करार जवाब दिया है, जो लाख रुपये में कार निर्माण को महज मजाक समझते थे। नैनो के आने से सिर्फ़ भारतीयों का सिर ही गर्व से ऊँचा नहीं हुआ है, बल्कि इसने भारतीय लोगों की क्षमताओं के प्रति वैश्विक दृष्टिकोण को भी बदल दिया है।
बहरहाल नैनो को जनता से कैसा प्रतिसाद मिलता है, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन अगर आटोमोबाइल विशेषज्ञों की मानें तो लखटकिया को पसंद करने वाला एक अलग ही उपभोक्ता वर्ग है। फिलहाल कुछ दिनों बाद ही हमें नैनो सड़कों पर दौड़ती दिखाई देगी।
Wednesday, February 18, 2009
मोबाइल के अलग-अलग चार्जरों से मिलेगी मुक्ति

तकनीक में हो रहे नित नए विकास का एक और कारनामा जल्द ही हमारे सामने होगा। आने वाले कुछ समय में मोबाइल चार्ज करने के लिए हमें अलग - अलग चार्जरों की जरूरत नहीं पड़ेगी। जी हाँ वैश्विक मोबाईल फ़ोन संस्था (ग्लोबल सर्विस मोबाइल असोसिएशन) की बार्सिलोना में हुयी वर्ल्ड मोबाइल कांफ्रेंस में कहा गया है कि अगले तीन सालों के अन्दर मोबाइल में यू एस बी (यूनिवर्सल सीरियल बस ) पोर्ट होगा, जिसकी मदद से एक ही चार्जर के द्वारा कई कम्पनियों के मोबाइल चार्ज हो सकेंगे।
वर्ल्ड मोबाइल कांफ्रेंस के दौरान जिन कम्पनियों के बीच यू एस बी पोर्ट वाले चार्जर को लेकर समझौता हुआ है उनमे विश्व की नामी-गिरामी मोबाइल कंपनियाँ भी शामिल हैं। इनमें एल जी, मोटोरोला, सैमसंग, सोनी एरिक्सन, नोकिया, वोडाफोन आदि कम्पनियों के नाम प्रमुख हैं।
Wednesday, January 28, 2009
आख़िर क्यों नहीं घटीं ब्याज दरें : मौद्रिक नीति

Friday, January 23, 2009
सत्यम को खरीदने की मची होड़

Sunday, January 18, 2009
अब सेबी करेगा बही-खातों की जांच

Thursday, January 15, 2009
मंदी भी नहीं लगा सकी शौकीनों पर पाबंदी
मंदी से अप्रभावित रहते हुए जिस एक और सेक्टर ने धूम मचाई है, वो है प्लेजर इंडस्ट्री । प्लेजर इंडस्ट्री से आशय कंडोम और सेक्स सम्बन्धी उत्पाद बनाने वाली कम्पनियों से है, जिनकी बिक्री में पिछले साल की तुलना में भले ही ज्यादा फर्क न पड़ा हो, लेकिन मंदी के बावजूद शौकीन और आम लोगों में जागरूकता देखी गई। यही वजह रही कि इसकी मांग और बिक्री बनी रही।
Wednesday, January 14, 2009
आख़िर कैसे मिलेगा निवेशकों को न्याय?
Tuesday, January 6, 2009
चीनी के बढ़ते दामों से सरकार चिंतित
पिछले कुछ महीनों से चीनी के दाम 20-21 रुपये/किलो चल रहे हैं, और आने वाले समय में इसके दाम 10 रुपये/किलो तक बढ़ सकते हैं। चीनी के दामों में हो रही बढोत्तरी से चिंतित सरकार अब कुछ कड़े कदम उठाने पर विचार कर रही है , जिसके चलते चीनी कम्पनियों को निर्यात के लिए रिलीज़ आर्डर का इस्तेमाल न करने की मनाही हो सकती है। इसके साथ ही सरकार रिलीज़ आर्डर सिस्टम के तहत होने वाले चीनी निर्यात पर भी नज़र रखेगी। जिसमे चीनी निर्यात के लिए खाद्य मंत्रालय से अनुमति लेने की जरूरत होती है। पिछले कुछ समय से चीनी के दामों में हो रही लगातार वृद्धि के कारण सरकार को यह कदम उठाना पड़ रहा है, ताकि निर्यात कम कर चीनी की आपूर्ति बढाई जा सके। बाज़ार में चीनी की पर्याप्त आपूर्ति होने पर उसके दाम में निश्चित रूप से कमी आएगी। लेकिन इन सब उपायों के बावजूद हाल ही में हुयी ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल ने सरकार के मंसूबों पर पानी फेर दिया है, और ऐसे में चीनी की कीमत कम होने की उम्मीद कम ही है। खैर अब देखना ये है की आख़िर सरकार चीनी के निर्यात में कमी लाकर इसकी बढती हुयी कीमत पर कैसे काबू पाती है।
बीमा कम्पनियों को मिला नए साल का तोहफा

इस तरह नए साल में इरडा ने बीमा कम्पनियों को साल्वेंसी मार्जिन में कटौती का तोहफा दिया है। लेकिन बीमा कंपनियाँ अगर अपने ग्राहकों को अपनी योजनाओं में लिए जाने वाले अतिरिक्त चार्जेस (प्रभार) को कम करेंगी, तो इस तोहफे का लाभ उनके साथ-साथ उनके कस्टमर्स को भी मिल सकेगा। इसके साथ ही नए कस्टमर्स यूलिप प्लान्स की ओर आकर्षित भी होंगे। मतलब कुल मिलकर यह है की इरडा द्वारा मिली इस सौगात को बीमा कंपनियाँ अपने कस्टमर्स के साथ बांटकर अपने लाभ को बेहतर तरीके से भुना सकती हैं।